श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.73.23

दशम स्कन्ध · अध्याय 73 · अथ त्रिसप्ततितमोऽध्यायः

उदासीनाश्‍च देहादावात्मारामा धृतव्रताः।

मय्यावेश्य मनः सम्यङ् मामन्ते ब्रह्म यास्यथ॥ २३

udāsīnāśca dehādāvātmārāmā dhṛtavratāḥ|

mayyāveśya manaḥ samyaṅ māmante brahma yāsyatha|| 23

अर्थ

देह और देहके सम्बन्धियोंसे किसी प्रकारकी आसक्ति न रखकर उदासीन रहो; अपने-आपमें, आत्मामें ही रमण करो और भजन तथा आश्रमके योग्य व्रतोंका पालन करते रहो। अपना मन भलीभाँति मुझमें लगाकर अन्तमें तुमलोग मुझ ब्रह्मस्वरूपको ही प्राप्त हो जाओगे॥ २३॥✎ 1710

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #1710 पंक्तिके अन्तका योजक-चिह्न: तुम-लोगोंने → तुमलोगोंने

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