देह और देहके सम्बन्धियोंसे किसी प्रकारकी आसक्ति न रखकर उदासीन रहो; अपने-आपमें, आत्मामें ही रमण करो और भजन तथा आश्रमके योग्य व्रतोंका पालन करते रहो। अपना मन भलीभाँति मुझमें लगाकर अन्तमें तुमलोग मुझ ब्रह्मस्वरूपको ही प्राप्त हो जाओगे॥ २३॥✎ 1710
उदासीनाश्च देहादावात्मारामा धृतव्रताः।
मय्यावेश्य मनः सम्यङ् मामन्ते ब्रह्म यास्यथ॥ २३
देह और देहके सम्बन्धियोंसे किसी प्रकारकी आसक्ति न रखकर उदासीन रहो; अपने-आपमें, आत्मामें ही रमण करो और भजन तथा आश्रमके योग्य व्रतोंका पालन करते रहो। अपना मन भलीभाँति मुझमें लगाकर अन्तमें तुमलोग मुझ ब्रह्मस्वरूपको ही प्राप्त हो जाओगे॥ २३॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 10.73.23 · गीताप्रेस, गोरखपुर (द्वितीय खण्ड, पृष्ठ 589) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/73/23/इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)