राजाओंने कहा—शरणागतोंके सारे दुःख और भय हर लेनेवाले देवदेवेश्वर! सच्चिदानन्दस्वरूप अविनाशी श्रीकृष्ण! हम आपको नमस्कार करते हैं। आपने जरासन्धके कारागारसे तो हमें छुड़ा ही दिया, अब इस जन्म-मृत्युरूप घोर संसार-चक्रसे भी छुड़ा दीजिये; क्योंकि हम संसारमें दुःखका कटु अनुभव करके उससे ऊब गये हैं और आपकी शरणमें आये हैं। प्रभो! अब आप हमारी रक्षा कीजिये॥ ८॥✎ 1709
नमस्ते देवदेवेश प्रपन्नार्तिहराव्यय।
प्रपन्नान् पाहि नः कृष्ण निर्विण्णान् घोरसंसृतेः॥ ८
राजाओंने कहा—शरणागतोंके सारे दुःख और भय हर लेनेवाले देवदेवेश्वर! सच्चिदानन्दस्वरूप अविनाशी श्रीकृष्ण! हम आपको नमस्कार करते हैं। आपने जरासन्धके कारागारसे तो हमें छुड़ा ही दिया, अब इस जन्म-मृत्युरूप घोर संसार-चक्रसे भी छुड़ा दीजिये; क्योंकि हम संसारमें दुःखका कटु अनुभव करके उससे ऊब गये हैं और आपकी शरणमें आये हैं। प्रभो! अब आप हमारी रक्षा कीजिये॥ ८॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 10.73.8 · गीताप्रेस, गोरखपुर (द्वितीय खण्ड, पृष्ठ 587) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/73/8/इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)