श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.74.14

दशम स्कन्ध · अध्याय 74 · अथ चतुःसप्ततितमोऽध्यायः

सगणाः सिद्धगन्धर्वा विद्याधरमहोरगाः।

मुनयो यक्षरक्षांसि खगकिन्‍नरचारणाः॥ १४

sagaṇāḥ siddhagandharvā vidyādharamahoragāḥ|

munayo yakṣarakṣāṃsi khagakinnaracāraṇāḥ|| 14

अर्थ

प्राचीन कालमें जैसे वरुणदेवके यज्ञमें सब-के-सब यज्ञपात्र सोनेके बने हुए थे, वैसे ही युधिष्ठिरके यज्ञमें भी थे। पाण्डुनन्दन महाराज युधिष्ठिरके यज्ञमें निमन्त्रण पाकर ब्रह्माजी, शंकरजी, इन्द्रादि लोकपाल, अपने गणोंके साथ सिद्ध और गन्धर्व, विद्याधर, नाग, मुनि, यक्ष, राक्षस, पक्षी, किन्‍नर, चारण, बड़े-बड़े राजा और रानियाँ—ये सभी उपस्थित हुए॥ १३—१५॥

यह अर्थ श्लोक 13–15 का एक साथ है, जैसा मुद्रित ग्रन्थमें।

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