॥ श्रीहरिः ॥
श्लोक 10.74.15
राजानश्च समाहूता राजपत्न्यश्च सर्वशः।
राजसूयं समीयुः स्म राज्ञः पाण्डुसुतस्य वै॥ १५
rājānaśca samāhūtā rājapatnyaśca sarvaśaḥ|
rājasūyaṃ samīyuḥ sma rājñaḥ pāṇḍusutasya vai|| 15
अर्थ
प्राचीन कालमें जैसे वरुणदेवके यज्ञमें सब-के-सब यज्ञपात्र सोनेके बने हुए थे, वैसे ही युधिष्ठिरके यज्ञमें भी थे। पाण्डुनन्दन महाराज युधिष्ठिरके यज्ञमें निमन्त्रण पाकर ब्रह्माजी, शंकरजी, इन्द्रादि लोकपाल, अपने गणोंके साथ सिद्ध और गन्धर्व, विद्याधर, नाग, मुनि, यक्ष, राक्षस, पक्षी, किन्नर, चारण, बड़े-बड़े राजा और रानियाँ—ये सभी उपस्थित हुए॥ १३—१५॥