श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
⌕

॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.74.15

दशम स्कन्ध · अध्याय 74 · अथ चतुःसप्ततितमोऽध्यायः

राजानश्‍च समाहूता राजपत्‍न्यश्‍च सर्वशः।

राजसूयं समीयुः स्म राज्ञः पाण्डुसुतस्य वै॥ १५

rājānaśca samāhūtā rājapatnyaśca sarvaśaḥ|

rājasūyaṃ samīyuḥ sma rājñaḥ pāṇḍusutasya vai|| 15

अर्थ

प्राचीन कालमें जैसे वरुणदेवके यज्ञमें सब-के-सब यज्ञपात्र सोनेके बने हुए थे, वैसे ही युधिष्ठिरके यज्ञमें भी थे। पाण्डुनन्दन महाराज युधिष्ठिरके यज्ञमें निमन्त्रण पाकर ब्रह्माजी, शंकरजी, इन्द्रादि लोकपाल, अपने गणोंके साथ सिद्ध और गन्धर्व, विद्याधर, नाग, मुनि, यक्ष, राक्षस, पक्षी, किन्‍नर, चारण, बड़े-बड़े राजा और रानियाँ—ये सभी उपस्थित हुए॥ १३—१५॥

यह अर्थ श्लोक 13–15 का एक साथ है, जैसा मुद्रित ग्रन्थमें।

पढ़नेकी विधि

अक्षरका आकार
सामान्य
अध्यायमें क्या दिखे
रोमन लिप्यन्तरण (IAST)
पंक्तियोंके बीच
रंग
सहायता

ये विकल्प केवल इसी ब्राउज़रमें रहते हैं; कहीं भेजे नहीं जाते। कुंजियाँ: ?

↑ ↓ चुनें · Enter खोलें · Esc बन्द

कुंजियाँ

←→
पिछला या अगला पृष्ठ (श्लोक, या अध्याय)
/
खोज
CtrlK
किसी अध्याय या श्लोकपर सीधे जाएँ (Mac: ⌘ K)
AltA
पढ़नेकी विधि
?
यह सूची
Esc
खुली सूची बन्द करें