श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.74.16

दशम स्कन्ध · अध्याय 74 · अथ चतुःसप्ततितमोऽध्यायः

मेनिरे कृष्णभक्तस्य सूपपन्‍नमविस्मिताः।

अयाजयन् महाराजं याजका देववर्चसः।

राजसूयेन विधिवत् प्राचेतसमिवामराः॥ १६

menire kṛṣṇabhaktasya sūpapannamavismitāḥ|

ayājayan mahārājaṃ yājakā devavarcasaḥ|

rājasūyena vidhivat prācetasamivāmarāḥ|| 16

अर्थ

सबने बिना किसी प्रकारके कौतूहलके यह बात मान ली कि राजसूय-यज्ञ करना युधिष्ठिरके योग्य ही है। क्योंकि भगवान् श्रीकृष्णके भक्तके लिये ऐसा करना कोई बहुत बड़ी बात नहीं है। उस समय देवताओंके समान तेजस्वी याजकोंने धर्मराज युधिष्ठिरसे विधिपूर्वक राजसूय-यज्ञ कराया; ठीक वैसे ही, जैसे पूर्वकालमें देवताओंने वरुणसे करवाया था॥ १६॥

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