श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.74.39

दशम स्कन्ध · अध्याय 74 · अथ चतुःसप्ततितमोऽध्यायः

भगवन्‍निन्दनं श्रुत्वा दुःसहं तत् सभासदः।

कर्णौ पिधाय निर्जग्मुः शपन्तश्‍चेदिपं रुषा॥ ३९

bhagavannindanaṃ śrutvā duḥsahaṃ tat sabhāsadaḥ|

karṇau pidhāya nirjagmuḥ śapantaścedipaṃ ruṣā|| 39

अर्थ

परन्तु सभासदोंके लिये भगवान्‌की निन्दा सुनना असह्य था। उनमेंसे कई अपने-अपने कान बंद करके क्रोधसे शिशुपालको गाली देते हुए बाहर चले गये॥ ३९॥

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