श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.74.40

दशम स्कन्ध · अध्याय 74 · अथ चतुःसप्ततितमोऽध्यायः

निन्दां भगवतः शृण्वंस्तत्परस्य जनस्य वा।

ततो नापैति यः सोऽपि यात्यधः सुकृताच्च्युतः॥ ४०

nindāṃ bhagavataḥ śṛṇvaṃstatparasya janasya vā|

tato nāpaiti yaḥ so'pi yātyadhaḥ sukṛtāccyutaḥ|| 40

अर्थ

परीक्षित्! जो भगवान्‌की या भगवत्परायण भक्तोंकी निन्दा सुनकर वहाँसे हट नहीं जाता, वह अपने शुभकर्मोंसे च्युत हो जाता है और उसकी अधोगति होती है॥ ४०॥

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