tato nāpaiti yaḥ so'pi yātyadhaḥ sukṛtāccyutaḥ|| 40
अर्थ
परीक्षित्! जो भगवान्की या भगवत्परायण भक्तोंकी निन्दा सुनकर वहाँसे हट नहीं जाता, वह अपने शुभकर्मोंसे च्युत हो जाता है और उसकी अधोगति होती है॥ ४०॥
निन्दां भगवतः शृण्वंस्तत्परस्य जनस्य वा।
ततो नापैति यः सोऽपि यात्यधः सुकृताच्च्युतः॥ ४०
परीक्षित्! जो भगवान्की या भगवत्परायण भक्तोंकी निन्दा सुनकर वहाँसे हट नहीं जाता, वह अपने शुभकर्मोंसे च्युत हो जाता है और उसकी अधोगति होती है॥ ४०॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 10.74.40 · गीताप्रेस, गोरखपुर (द्वितीय खण्ड, पृष्ठ 595) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/74/40/