श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.74.4

दशम स्कन्ध · अध्याय 74 · अथ चतुःसप्ततितमोऽध्यायः

न ह्येकस्याद्वितीयस्य ब्रह्मणः परमात्मनः।

कर्मभिर्वर्धते तेजो ह्रसते च यथा रवेः॥ ४

na hyekasyādvitīyasya brahmaṇaḥ paramātmanaḥ|

karmabhirvardhate tejo hrasate ca yathā raveḥ|| 4

अर्थ

जैसे उदय अथवा अस्तके कारण सूर्यके तेजमें घटती या बढ़ती नहीं होती, वैसे ही किसी भी प्रकारके कर्मोंसे न तो आपका उल्लास होता है और न तो ह्रास ही। क्योंकि आप सजातीय, विजातीय और स्वगतभेदसे रहित स्वयं परब्रह्म परमात्मा हैं॥ ४॥✎ 1439

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #1439 अक्षर (मुद्रित पृष्ठके पाठसे): ह्रस → ह्रास

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