॥ श्रीहरिः ॥
श्लोक 10.74.5
न वै तेऽजित भक्तानां ममाहमिति माधव।
त्वं तवेति च नानाधीः पशूनामिव वैकृता॥ ५
na vai te'jita bhaktānāṃ mamāhamiti mādhava|
tvaṃ taveti ca nānādhīḥ paśūnāmiva vaikṛtā|| 5
अर्थ
किसीसे पराजित न होनेवाले माधव! ‘यह मैं हूँ और यह मेरा है तथा यह तू है और यह तेरा’—इस प्रकारकी विकारयुक्त भेदबुद्धि तो पशुओंकी होती है। जो आपके अनन्य भक्त हैं, उनके चित्तमें ऐसे पागलपनके विचार कभी नहीं आते। फिर आपमें तो होंगे ही कहाँसे? (इसलिये आप जो कुछ कर रहे हैं, वह लीला-ही-लीला है)॥ ५॥✎ 1439