॥ श्रीहरिः ॥
राजसूयावभृथ्येन स्नातो राजा युधिष्ठिरः।
ब्रह्मक्षत्रसभामध्ये शुशुभे सुरराडिव॥ ५१
rājasūyāvabhṛthyena snāto rājā yudhiṣṭhiraḥ|
brahmakṣatrasabhāmadhye śuśubhe surarāḍiva|| 51
अर्थ
महाराज युधिष्ठिर राजसूयका यज्ञान्त-स्नान करके ब्राह्मण और क्षत्रियोंकी सभामें देवराज इन्द्रके समान शोभायमान होने लगे॥ ५१॥
राजसूयावभृथ्येन स्नातो राजा युधिष्ठिरः।
ब्रह्मक्षत्रसभामध्ये शुशुभे सुरराडिव॥ ५१
महाराज युधिष्ठिर राजसूयका यज्ञान्त-स्नान करके ब्राह्मण और क्षत्रियोंकी सभामें देवराज इन्द्रके समान शोभायमान होने लगे॥ ५१॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 10.74.51 · गीताप्रेस, गोरखपुर (द्वितीय खण्ड, पृष्ठ 596) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/74/51/