श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.74.53

दशम स्कन्ध · अध्याय 74 · अथ चतुःसप्ततितमोऽध्यायः

दुर्योधनमृते पापं कलिं कुरुकुलामयम्।

यो न सेहे श्रियं स्फीतां दृष्ट्वा पाण्डुसुतस्य ताम्॥ ५३

duryodhanamṛte pāpaṃ kaliṃ kurukulāmayam|

yo na sehe śriyaṃ sphītāṃ dṛṣṭvā pāṇḍusutasya tām|| 53

अर्थ

परीक्षित्! सब तो सुखी हुए, परन्तु दुर्योधनसे पाण्डवोंकी यह उज्ज्वल राज्यलक्ष्मीका उत्कर्ष सहन न हुआ। क्योंकि वह स्वभावसे ही पापी, कलहप्रेमी और कुरुकुलका नाश करनेके लिये एक महान् रोग था॥ ५३॥

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