॥ श्रीहरिः ॥
श्लोक 10.75.23
बन्धुज्ञातिनृपान् मित्रसुहृदोऽन्यांश्च सर्वशः।
अभीक्ष्णं पूजयामास नारायणपरो नृपः॥ २३
bandhujñātinṛpān mitrasuhṛdo'nyāṃśca sarvaśaḥ|
abhīkṣṇaṃ pūjayāmāsa nārāyaṇaparo nṛpaḥ|| 23
अर्थ
महाराज युधिष्ठिर भगवत्परायण थे, उन्हें सबमें भगवान्के ही दर्शन होते। इसलिये वे भाई-बन्धु, कुटुम्बी, नरपति, इष्ट-मित्र, हितैषी और सभी लोगोंकी बार-बार पूजा करते॥ २३॥