॥ श्रीहरिः ॥
श्लोक 10.75.24
सर्वे जनाः सुररुचो मणिकुण्डलस्र-
गुष्णीषकंचुकदुकूलमहार्घ्यहाराः ।
नार्यश्च कुण्डलयुगालकवृन्दजुष्ट-
वक्त्रश्रियः कनकमेखलया विरेजुः॥ २४
sarve janāḥ suraruco maṇikuṇḍalasra-
guṣṇīṣakaṃcukadukūlamahārghyahārāḥ |
nāryaśca kuṇḍalayugālakavṛndajuṣṭa-
vaktraśriyaḥ kanakamekhalayā virejuḥ|| 24
अर्थ
उस समय सभी लोग जड़ाऊ कुण्डल, पुष्पोंके हार, पगड़ी, लंबी अँगरखी, दुपट्टा तथा मणियोंके बहुमूल्य हार पहनकर देवताओंके समान शोभायमान हो रहे थे। स्त्रियोंके मुखोंकी भी दोनों कानोंके कर्णफूल और घुँघराली अलकोंसे बड़ी शोभा हो रही थी तथा उनके कटिभागमें सोनेकी करधनियाँ तो बहुत ही भली मालूम हो रही थीं॥ २४॥