श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.76.21

दशम स्कन्ध · अध्याय 76 · अथ षट्सप्ततितमोऽध्यायः

बहुरूपैकरूपं तद् दृश्यते न च दृश्यते।

मायामयं मयकृतं दुर्विभाव्यं परैरभूत्॥ २१

bahurūpaikarūpaṃ tad dṛśyate na ca dṛśyate|

māyāmayaṃ mayakṛtaṃ durvibhāvyaṃ parairabhūt|| 21

अर्थ

परीक्षित्! मय दानवका बनाया हुआ शाल्वका वह विमान अत्यन्त मायामय था। वह इतना विचित्र था कि कभी अनेक रूपोंमें दीखता तो कभी एक रूपमें, कभी दीखता तो कभी न भी दीखता। यदुवंशियोंको इस बातका पता ही न चलता कि वह इस समय कहाँ है॥ २१॥

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