alātacakravad bhrāmyat saubhaṃ tad duravasthitam|| 22
अर्थ
वह कभी पृथ्वीपर आ जाता तो कभी आकाशमें उड़ने लगता। कभी पहाड़की चोटीपर चढ़ जाता तो कभी जलमें तैरने लगता। वह अलातचक्रके समान—मानो कोई दुमुँही लुकारियोंकी बनेठी भाँज रहा हो—घूमता रहता था, एक क्षणके लिये भी कहीं ठहरता न था॥ २२॥
क्वचिद् भूमौ क्वचिद् व्योम्नि गिरिमूर्ध्नि जले क्वचित्।
अलातचक्रवद् भ्राम्यत् सौभं तद् दुरवस्थितम्॥ २२
वह कभी पृथ्वीपर आ जाता तो कभी आकाशमें उड़ने लगता। कभी पहाड़की चोटीपर चढ़ जाता तो कभी जलमें तैरने लगता। वह अलातचक्रके समान—मानो कोई दुमुँही लुकारियोंकी बनेठी भाँज रहा हो—घूमता रहता था, एक क्षणके लिये भी कहीं ठहरता न था॥ २२॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 10.76.22 · गीताप्रेस, गोरखपुर (द्वितीय खण्ड, पृष्ठ 604) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/76/22/