॥ श्रीहरिः ॥
व्यक्तं मे कथयिष्यन्ति हसन्त्यो भ्रातृजामयः।
क्लैब्यं कथं कथं वीर तवान्यैः कथ्यतां मृधे॥ ३१
vyaktaṃ me kathayiṣyanti hasantyo bhrātṛjāmayaḥ|
klaibyaṃ kathaṃ kathaṃ vīra tavānyaiḥ kathyatāṃ mṛdhe|| 31
अर्थ
मेरी भाभियाँ हँसती हुई मुझसे साफ-साफ पूछेंगी कि ‘कहो, वीर! तुम नपुंसक कैसे हो गये? दूसरोंने युद्धमें तुम्हें नीचा कैसे दिखा दिया?’ ‘सूत! अवश्य ही तुमने मुझे रणभूमिसे भगाकर अक्षम्य अपराध किया है!’॥ ३१॥
व्यक्तं मे कथयिष्यन्ति हसन्त्यो भ्रातृजामयः।
क्लैब्यं कथं कथं वीर तवान्यैः कथ्यतां मृधे॥ ३१
मेरी भाभियाँ हँसती हुई मुझसे साफ-साफ पूछेंगी कि ‘कहो, वीर! तुम नपुंसक कैसे हो गये? दूसरोंने युद्धमें तुम्हें नीचा कैसे दिखा दिया?’ ‘सूत! अवश्य ही तुमने मुझे रणभूमिसे भगाकर अक्षम्य अपराध किया है!’॥ ३१॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 10.76.31 · गीताप्रेस, गोरखपुर (द्वितीय खण्ड, पृष्ठ 605) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/76/31/