यदुवंशशिरोमणे! सूतजीको हम लोगोंने ही ब्राह्मणोचित आसनपर बैठाया था और जबतक हमारा यह सत्र समाप्त न हो, तबतकके लिये उन्हें शारीरिक कष्टसे रहित आयु भी दे दी थी॥ ३०॥
अस्य ब्रह्मासनं दत्तमस्माभिर्यदुनन्दन।
आयुश्चात्माक्लमं तावद् यावत् सत्रं समाप्यते॥ ३०
यदुवंशशिरोमणे! सूतजीको हम लोगोंने ही ब्राह्मणोचित आसनपर बैठाया था और जबतक हमारा यह सत्र समाप्त न हो, तबतकके लिये उन्हें शारीरिक कष्टसे रहित आयु भी दे दी थी॥ ३०॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 10.78.30 · गीताप्रेस, गोरखपुर (द्वितीय खण्ड, पृष्ठ 614) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/78/30/