श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.78.6

दशम स्कन्ध · अध्याय 78 · अथाष्टसप्ततितमोऽध्यायः

तर्ह्यानृण्यमुपैम्यज्ञ मित्राणां मित्रवत्सलः।

बन्धुरूपमरिं हत्वा व्याधिं देहचरं यथा॥ ६

tarhyānṛṇyamupaimyajña mitrāṇāṃ mitravatsalaḥ|

bandhurūpamariṃ hatvā vyādhiṃ dehacaraṃ yathā|| 6

अर्थ

मूर्ख! वैसे तो तुम मेरे सम्बन्धी हो, फिर भी हो शत्रु ही, जैसे अपने ही शरीरमें रहनेवाला कोई रोग हो! मैं अपने मित्रोंसे बड़ा प्रेम करता हूँ, उनका मुझपर ऋण है। अब तुम्हें मारकर ही मैं उनके ऋणसे उऋण हो सकता हूँ॥ ६॥

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