उन्हें देखकर नन्दबाबाको बड़ी प्रसन्नता हुई। वे हाथ जोड़कर उठ खड़े हुए। उनके चरणोंमें प्रणाम किया। इसके बाद ‘ये स्वयं भगवान् ही हैं’—इस भावसे उनकी पूजा की॥ २॥
तं दृष्ट्वा परमप्रीतः प्रत्युत्थाय कृतांजलिः।
आनर्चाधोक्षजधिया प्रणिपातपुरःसरम्॥ २
उन्हें देखकर नन्दबाबाको बड़ी प्रसन्नता हुई। वे हाथ जोड़कर उठ खड़े हुए। उनके चरणोंमें प्रणाम किया। इसके बाद ‘ये स्वयं भगवान् ही हैं’—इस भावसे उनकी पूजा की॥ २॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 10.8.2 · गीताप्रेस, गोरखपुर (द्वितीय खण्ड, पृष्ठ 167) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/8/2/