श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.8.29

दशम स्कन्ध · अध्याय 8 · अथाष्टमोऽध्यायः

वत्सान् मुंचन् क्वचिदसमये क्रोशसंजातहासः

स्तेयं स्वाद्वत्त्यथ दधि पयः कल्पितैः स्तेययोगैः।

मर्कान् भोक्ष्यन् विभजति स चेन्‍नात्ति भाण्डं भिनत्ति

द्रव्यालाभे स गृहकुपितो यात्युपक्रोश्य तोकान्॥ २९

vatsān muṃcan kvacidasamaye krośasaṃjātahāsaḥ

steyaṃ svādvattyatha dadhi payaḥ kalpitaiḥ steyayogaiḥ|

markān bhokṣyan vibhajati sa cennātti bhāṇḍaṃ bhinatti

dravyālābhe sa gṛhakupito yātyupakrośya tokān|| 29

अर्थ

‘अरी यशोदा! यह तेरा कान्हा बड़ा नटखट हो गया है। गाय दुहनेका समय न होनेपर भी यह बछड़ोंको खोल देता है और हम डाँटती हैं, तो ठठा-ठठाकर हँसने लगता है। यह चोरीके बड़े-बड़े उपाय करके हमारे मीठे-मीठे दही-दूध चुरा-चुराकर खा जाता है। केवल अपने ही खाता तो भी एक बात थी, यह तो सारा दही-दूध वानरोंको बाँट देता है और जब वे भी पेट भर जानेपर नहीं खा पाते, तब यह हमारे माटोंको ही फोड़ डालता है। यदि घरमें कोई वस्तु इसे नहीं मिलती तो यह घर और घरवालोंपर बहुत खीझता है और हमारे बच्चोंको रुलाकर भाग जाता है॥ २९॥✎ 1403

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
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