श्रीशुकदेवजीने कहा—परीक्षित्! नन्दबाबा पूर्वजन्ममें एक श्रेष्ठ वसु थे। उनका नाम था द्रोण और उनकी पत्नीका नाम था धरा। उन्होंने ब्रह्माजीके आदेशोंका पालन करनेकी इच्छासे उनसे कहा—॥ ४८॥
द्रोणो वसूनां प्रवरो धरया सह भार्यया।
करिष्यमाण आदेशान् ब्रह्मणस्तमुवाच ह॥ ४८
श्रीशुकदेवजीने कहा—परीक्षित्! नन्दबाबा पूर्वजन्ममें एक श्रेष्ठ वसु थे। उनका नाम था द्रोण और उनकी पत्नीका नाम था धरा। उन्होंने ब्रह्माजीके आदेशोंका पालन करनेकी इच्छासे उनसे कहा—॥ ४८॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 10.8.48 · गीताप्रेस, गोरखपुर (द्वितीय खण्ड, पृष्ठ 180) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/8/48/