॥ श्रीहरिः ॥
श्लोक 10.80.16
त्रीणि गुल्मान्यतीयाय तिस्रः कक्षाश्च स द्विजः।
विप्रोऽगम्यान्धकवृष्णीनां गृहेष्वच्युतधर्मिणाम्॥ १६
trīṇi gulmānyatīyāya tisraḥ kakṣāśca sa dvijaḥ|
vipro'gamyāndhakavṛṣṇīnāṃ gṛheṣvacyutadharmiṇām|| 16
अर्थ
परीक्षित्! द्वारकामें पहुँचनेपर वे ब्राह्मणदेवता दूसरे ब्राह्मणोंके साथ सैनिकोंकी तीन छावनियाँ और तीन ड्योढ़ियाँ पार करके भगवद्धर्मका पालन करनेवाले अन्धक और वृष्णिवंशी यादवोंके महलोंमें, जहाँ पहुँचना अत्यन्त कठिन है, जा पहुँचे॥ १६॥