उनके बीच भगवान् श्रीकृष्णकी सोलह हजार रानियोंके महल थे। उनमेंसे एकमें उन ब्राह्मणदेवताने प्रवेश किया। वह महल खूब सजा-सजाया—अत्यन्त शोभा-युक्त था। उसमें प्रवेश करते समय उन्हें ऐसा मालूम हुआ, मानो वे ब्रह्मानन्दके समुद्रमें डूब-उतरा रहे हों!॥ १७॥
गृहं द्व्यष्टसहस्राणां महिषीणां हरेर्द्विजः।
विवेशैकतमं श्रीमद् ब्रह्मानन्दं गतो यथा॥ १७
उनके बीच भगवान् श्रीकृष्णकी सोलह हजार रानियोंके महल थे। उनमेंसे एकमें उन ब्राह्मणदेवताने प्रवेश किया। वह महल खूब सजा-सजाया—अत्यन्त शोभा-युक्त था। उसमें प्रवेश करते समय उन्हें ऐसा मालूम हुआ, मानो वे ब्रह्मानन्दके समुद्रमें डूब-उतरा रहे हों!॥ १७॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 10.80.17 · गीताप्रेस, गोरखपुर (द्वितीय खण्ड, पृष्ठ 621) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/80/17/