श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.80.33

दशम स्कन्ध · अध्याय 80 · अथाशीतितमोऽध्यायः

नन्वर्थकोविदा ब्रह्मन् वर्णाश्रमवतामिह।

ये मया गुरुणा वाचा तरन्त्यंजो भवार्णवम्॥ ३३

nanvarthakovidā brahman varṇāśramavatāmiha|

ye mayā guruṇā vācā tarantyaṃjo bhavārṇavam|| 33

अर्थ

मेरे प्यारे मित्र! गुरुके स्वरूपमें स्वयं मैं हूँ। इस जगत‍्में वर्णाश्रमियोंमें जो लोग अपने गुरुदेवके उपदेशानुसार अनायास ही भवसागर पार कर लेते हैं, वे अपने स्वार्थ और परमार्थके सच्चे जानकार हैं॥ ३३॥

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