श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.80.34

दशम स्कन्ध · अध्याय 80 · अथाशीतितमोऽध्यायः

नाहमिज्याप्रजातिभ्यां तपसोपशमेन वा।

तुष्येयं सर्वभूतात्मा गुरुशुश्रूषया यथा॥ ३४

nāhamijyāprajātibhyāṃ tapasopaśamena vā|

tuṣyeyaṃ sarvabhūtātmā guruśuśrūṣayā yathā|| 34

अर्थ

प्रिय मित्र! मैं सबका आत्मा हूँ, सबके हृदयमें अन्तर्यामीरूपसे विराजमान हूँ। मैं गृहस्थके धर्म पंचमहायज्ञ आदिसे, ब्रह्मचारीके धर्म उपनयन-वेदाध्ययन आदिसे, वानप्रस्थीके धर्म तपस्यासे और सब ओरसे उपरत हो जाना—इस संन्यासीके धर्मसे भी उतना सन्तुष्ट नहीं होता, जितना गुरुदेवकी सेवा-शुश्रूषासे सन्तुष्ट होता हूँ॥ ३४॥

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