श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.80.37

दशम स्कन्ध · अध्याय 80 · अथाशीतितमोऽध्यायः

सूर्यश्‍चास्तं गतस्तावत् तमसा चावृता दिशः।

निम्‍नं कूलं जलमयं न प्राज्ञायत किंचन॥ ३७

sūryaścāstaṃ gatastāvat tamasā cāvṛtā diśaḥ|

nimnaṃ kūlaṃ jalamayaṃ na prājñāyata kiṃcana|| 37

अर्थ

तबतक सूर्यास्त हो गया; चारों ओर अँधेरा-ही-अँधेरा फैल गया। धरतीपर इस प्रकार पानी-ही-पानी हो गया कि कहाँ गड्ढा है, कहाँ किनारा, इसका पता ही न चलता था॥ ३७॥

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