॥ श्रीहरिः ॥
श्लोक 10.81.18
शुश्रूषया परमया पादसंवाहनादिभिः।
पूजितो देवदेवेन विप्रदेवेन देववत्॥ १८
śuśrūṣayā paramayā pādasaṃvāhanādibhiḥ|
pūjito devadevena vipradevena devavat|| 18
अर्थ
ओह, देवताओंके आराध्यदेव होकर भी ब्राह्मणोंको अपना इष्टदेव माननेवाले प्रभुने पाँव दबाकर, अपने हाथों खिला-पिलाकर मेरी अत्यन्त सेवा-शुश्रूषा की और देवताके समान मेरी पूजा की॥ १८॥