॥ श्रीहरिः ॥
श्लोक 10.81.5
इत्युक्तोऽपि द्विजस्तस्मै व्रीडितः पतये श्रियः।
पृथुकप्रसृतिं राजन् न प्रायच्छदवाङ्मुखः॥ ५
ityukto'pi dvijastasmai vrīḍitaḥ pataye śriyaḥ|
pṛthukaprasṛtiṃ rājan na prāyacchadavāṅmukhaḥ|| 5
अर्थ
परीक्षित्! भगवान् श्रीकृष्णके ऐसा कहनेपर भी उन ब्राह्मणदेवताने लज्जावश उन लक्ष्मीपतिको वे चार मुट्ठी चिउड़े नहीं दिये। उन्होंने संकोचसे अपना मुँह नीचे कर लिया था। परीक्षित्! भगवान् श्रीकृष्ण समस्त प्राणियोंके हृदयका एक-एक संकल्प और उनका अभाव भी जानते हैं। उन्होंने ब्राह्मणके आनेका कारण, उनके हृदयकी बात जान ली। अब वे विचार करने लगे कि ‘एक तो यह मेरा प्यारा सखा है, दूसरे इसने पहले कभी लक्ष्मीकी कामनासे मेरा भजन नहीं किया है। इस समय यह अपनी पतिव्रता पत्नीको प्रसन्न करनेके लिये उसीके आग्रहसे यहाँ आया है। अब मैं इसे ऐसी सम्पत्ति दूँगा, जो देवताओंके लिये भी अत्यन्त दुर्लभ है’॥ ५—७॥