॥ श्रीहरिः ॥
श्लोक 10.82.16
स्त्रियश्च संवीक्ष्य मिथोऽतिसौहृद-
स्मितामलापांगदृशोऽभिरेभिरे ।
स्तनैः स्तनान् कुंकुमपंकरूषितान्
निहत्य दोर्भिः प्रणयाश्रुलोचनाः॥ १६
striyaśca saṃvīkṣya mitho'tisauhṛda-
smitāmalāpāṃgadṛśo'bhirebhire |
stanaiḥ stanān kuṃkumapaṃkarūṣitān
nihatya dorbhiḥ praṇayāśrulocanāḥ|| 16
अर्थ
पुरुषोंकी भाँति स्त्रियाँ भी एक-दूसरेको देखकर प्रेम और आनन्दसे भर गयीं। वे अत्यन्त सौहार्द, मन्द-मन्द मुसकान, परम पवित्र तिरछी चितवनसे देख-देखकर परस्पर भेंट-अँकवार भरने लगीं। वे अपनी भुजाओंमें भरकर केसर लगे हुए वक्षःस्थलोंको दूसरी स्त्रियोंके वक्षःस्थलोंसे दबातीं और अत्यन्त आनन्दका अनुभव करतीं। उस समय उनके नेत्रोंसे प्रेमके आँसू छलकने लगते॥ १६॥