श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.82.23

दशम स्कन्ध · अध्याय 82 · अथ द‍्व्यशीतितमोऽध्यायः

श्रीशुक उवाच

वसुदेवोग्रसेनाद्यैर्यदुभिस्तेऽर्चिता नृपाः।

आसन्‍नच्युतसन्दर्शपरमानन्दनिर्वृताः ॥ २३

vasudevograsenādyairyadubhiste'rcitā nṛpāḥ|

āsannacyutasandarśaparamānandanirvṛtāḥ || 23

अर्थ

श्रीशुकदेवजी कहते हैं—परीक्षित्! वहाँ जितने भी नरपति आये थे—वसुदेव, उग्रसेन आदि यदुवंशियोंने उनका खूब सम्मान-सत्कार किया। वे सब भगवान् श्रीकृष्णका दर्शन पाकर परमानन्द और शान्तिका अनुभव करने लगे॥ २३॥

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