‘भगवन्! बड़े बड़े महापुरुष मन-ही-मन आपके चरणारविन्दका मकरन्द रस पान करते रहते हैं। कभी-कभी उनके मुखकमलसे लीला-कथाके रूपमें वह रस छलक पड़ता है। प्रभो! वह इतना अद्भुत दिव्य रस है कि कोई भी प्राणी उसको पी ले तो वह जन्म-मृत्युके चक्करमें डालनेवाली विस्मृति अथवा अविद्याको नष्ट कर देता है। उसी रसको जो लोग अपने कानोंके दोनोंमें भर-भरकर जी-भर पीते हैं, उनके अमंगलकी आशंका ही क्या है?॥ ३॥✎ 1440
कुतोऽशिवं त्वच्चरणाम्बुजासवं
महन्मनस्तो मुखनिःसृतं क्वचित्।
पिबन्ति ये कर्णपुटैरलं प्रभो
देहम्भृतां देहकृदस्मृतिच्छिदम्॥ ३
‘भगवन्! बड़े बड़े महापुरुष मन-ही-मन आपके चरणारविन्दका मकरन्द रस पान करते रहते हैं। कभी-कभी उनके मुखकमलसे लीला-कथाके रूपमें वह रस छलक पड़ता है। प्रभो! वह इतना अद्भुत दिव्य रस है कि कोई भी प्राणी उसको पी ले तो वह जन्म-मृत्युके चक्करमें डालनेवाली विस्मृति अथवा अविद्याको नष्ट कर देता है। उसी रसको जो लोग अपने कानोंके दोनोंमें भर-भरकर जी-भर पीते हैं, उनके अमंगलकी आशंका ही क्या है?॥ ३॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 10.83.3 · गीताप्रेस, गोरखपुर (द्वितीय खण्ड, पृष्ठ 637) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/83/3/इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)