॥ श्रीहरिः ॥
श्लोक 10.83.4
हित्वाऽऽत्मधामविधुतात्मकृतत्र्यवस्थ- ✎ 2132
मानन्दसम्प्लवमखण्डमकुण्ठबोधम् ।
कालोपसृष्टनिगमावन आत्तयोग-
मायाकृतिं परमहंसगतिं नताः स्म॥ ४
hitvā''tmadhāmavidhutātmakṛtatryavastha-
mānandasamplavamakhaṇḍamakuṇṭhabodham |
kālopasṛṣṭanigamāvana āttayoga-
māyākṛtiṃ paramahaṃsagatiṃ natāḥ sma|| 4
अर्थ
भगवन्! आप एकरस ज्ञानस्वरूप और अखण्ड आनन्दके समुद्र हैं। बुद्धि-वृत्तियोंके कारण होनेवाली जाग्रत्, स्वप्न, सुषुप्ति—ये तीनों अवस्थाएँ आपके स्वयंप्रकाश स्वरूपतक पहुँच ही नहीं पातीं, दूरसे ही नष्ट हो जाती हैं। आप परमहंसोंकी एकमात्र गति हैं। समयके फेरसे वेदोंका ह्रास होते देखकर उनकी रक्षाके लिये आपने अपनी अचिन्त्य योगमायाके द्वारा मनुष्यका-सा शरीर ग्रहण किया है। हम आपके चरणोंमें बार-बार नमस्कार करते हैं’॥ ४॥✎ 1440