श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.84.12

दशम स्कन्ध · अध्याय 84 · अथ चतुरशीतितमोऽध्यायः

नाग्‍निर्न सूर्यो न च चन्द्रतारका

न भूर्जलं खं श्‍वसनोऽथ वाङ्मनः।

उपासिता भेदकृतो हरन्त्यघं

विपश्‍चितो घ्नन्ति मुहूर्तसेवया॥ १२

nāgnirna sūryo na ca candratārakā

na bhūrjalaṃ khaṃ śvasano'tha vāṅmanaḥ|

upāsitā bhedakṛto harantyaghaṃ

vipaścito ghnanti muhūrtasevayā|| 12

अर्थ

अग्‍नि, सूर्य, चन्द्रमा, तारे, पृथ्वी, जल, आकाश, वायु, वाणी और मनके अधिष्ठातृ-देवता उपासना करनेपर भी पापका पूरा-पूरा नाश नहीं कर सकते; क्योंकि उनकी उपासनासे भेद-बुद्धिका नाश नहीं होता, वह और भी बढ़ती है। परन्तु यदि घड़ी-दो-घड़ी भी ज्ञानी महापुरुषोंकी सेवा की जाय तो वे सारे पाप-ताप मिटा देते हैं; क्योंकि वे भेद-बुद्धिके विनाशक हैं॥ १२॥

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