श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.84.13

दशम स्कन्ध · अध्याय 84 · अथ चतुरशीतितमोऽध्यायः

यस्यात्मबुद्धिः कुणपे त्रिधातुके

स्वधीः कलत्रादिषु भौम इज्यधीः।

यत्तीर्थबुद्धिः सलिले न कर्हिचि-

ज्जनेष्वभिज्ञेषु स एव गोखरः॥ १३

yasyātmabuddhiḥ kuṇape tridhātuke

svadhīḥ kalatrādiṣu bhauma ijyadhīḥ|

yattīrthabuddhiḥ salile na karhici-

jjaneṣvabhijñeṣu sa eva gokharaḥ|| 13

अर्थ

महात्माओ और सभासदो! जो मनुष्य वात, पित्त और कफ—इन तीन धातुओंसे बने हुए शवतुल्य शरीरको ही आत्मा—अपना ‘मैं’, स्त्री-पुत्र आदिको ही अपना और मिट्टी, पत्थर, काष्ठ आदि पार्थिव विकारोंको ही इष्टदेव मानता है तथा जो केवल जलको ही तीर्थ समझता है—ज्ञानी महापुरुषोंको नहीं, वह मनुष्य होनेपर भी पशुओंमें भी नीच गधा ही है॥ १३॥

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