श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.84.26

दशम स्कन्ध · अध्याय 84 · अथ चतुरशीतितमोऽध्यायः

तस्याद्य ते ददृशिमाङ्‌घ्रिमघौघमर्ष-

तीर्थास्पदं हृदि कृतं सुविपक्वयोगैः।

उत्सिक्तभक्त्युपहताशयजीवकोशा

आपुर्भवद्गतिमथोऽनुगृहाण भक्तान्॥ २६

tasyādya te dadṛśimāṅghrimaghaughamarṣa-

tīrthāspadaṃ hṛdi kṛtaṃ suvipakvayogaiḥ|

utsiktabhaktyupahatāśayajīvakośā

āpurbhavadgatimatho'nugṛhāṇa bhaktān|| 26

अर्थ

प्रभो! बड़े-बड़े ऋषि-मुनि अत्यन्त परिपक्व योग-साधनाके द्वारा आपके उन चरणकमलोंको हृदयमें धारण करते हैं, जो समस्त पाप-राशिको नष्ट करनेवाले गंगाजलके भी आश्रय-स्थान हैं। यह बड़े सौभाग्यकी बात है कि आज हमें उन्हींका दर्शन हुआ है। प्रभो! हम आपके भक्त हैं, आप हमपर अनुग्रह कीजिये; क्योंकि आपके परम पदकी प्राप्ति उन्हीं लोगोंको होती है, जिनका लिंगशरीररूप जीव-कोश आपकी उत्कृष्ट भक्तिके द्वारा नष्ट हो जाता है॥ २६॥

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