श्रीशुकदेवजी कहते हैं—राजर्षे! भगवान्की इस प्रकार स्तुति करके और उनसे, राजा धृतराष्ट्रसे तथा धर्मराज युधिष्ठिरजीसे अनुमति लेकर उन लोगोंने अपने-अपने आश्रमपर जानेका विचार किया॥ २७॥
इत्यनुज्ञाप्य दाशार्हं धृतराष्ट्रं युधिष्ठिरम्।
राजर्षे स्वाश्रमान् गन्तुं मुनयो दधिरे मनः॥ २७
श्रीशुकदेवजी कहते हैं—राजर्षे! भगवान्की इस प्रकार स्तुति करके और उनसे, राजा धृतराष्ट्रसे तथा धर्मराज युधिष्ठिरजीसे अनुमति लेकर उन लोगोंने अपने-अपने आश्रमपर जानेका विचार किया॥ २७॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 10.84.27 · गीताप्रेस, गोरखपुर (द्वितीय खण्ड, पृष्ठ 647) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/84/27/