श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.84.28

दशम स्कन्ध · अध्याय 84 · अथ चतुरशीतितमोऽध्यायः

तद् वीक्ष्य तानुपव्रज्य वसुदेवो महायशाः।

प्रणम्य चोपसंगृह्य बभाषेदं सुयन्त्रितः॥ २८

tad vīkṣya tānupavrajya vasudevo mahāyaśāḥ|

praṇamya copasaṃgṛhya babhāṣedaṃ suyantritaḥ|| 28

अर्थ

परम यशस्वी वसुदेवजी उनका जानेका विचार देखकर उनके पास आये और उन्हें प्रणाम किया और उनके चरण पकड़कर बड़ी नम्रतासे निवेदन करने लगे॥ २८॥

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