वसुदेवजीने कहा—ऋषियो! आपलोग सर्वदेवस्वरूप हैं। मैं आपलोगोंको नमस्कार करता हूँ। आपलोग कृपा करके मेरी एक प्रार्थना सुन लीजिये। वह यह कि जिन कर्मोंके अनुष्ठानसे कर्मों और कर्मवासनाओंका आत्यन्तिक नाश—मोक्ष हो जाय, उनका आप मुझे उपदेश कीजिये॥ २९॥
नमो वः सर्वदेवेभ्य ऋषयः श्रोतुमर्हथ।
कर्मणा कर्मनिर्हारो यथा स्यान्नस्तदुच्यताम्॥ २९
वसुदेवजीने कहा—ऋषियो! आपलोग सर्वदेवस्वरूप हैं। मैं आपलोगोंको नमस्कार करता हूँ। आपलोग कृपा करके मेरी एक प्रार्थना सुन लीजिये। वह यह कि जिन कर्मोंके अनुष्ठानसे कर्मों और कर्मवासनाओंका आत्यन्तिक नाश—मोक्ष हो जाय, उनका आप मुझे उपदेश कीजिये॥ २९॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 10.84.29 · गीताप्रेस, गोरखपुर (द्वितीय खण्ड, पृष्ठ 647) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/84/29/