श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.84.29

दशम स्कन्ध · अध्याय 84 · अथ चतुरशीतितमोऽध्यायः

वसुदेव उवाच

नमो वः सर्वदेवेभ्य ऋषयः श्रोतुमर्हथ।

कर्मणा कर्मनिर्हारो यथा स्यान्‍नस्तदुच्यताम्॥ २९

namo vaḥ sarvadevebhya ṛṣayaḥ śrotumarhatha|

karmaṇā karmanirhāro yathā syānnastaducyatām|| 29

अर्थ

वसुदेवजीने कहा—ऋषियो! आपलोग सर्वदेवस्वरूप हैं। मैं आपलोगोंको नमस्कार करता हूँ। आपलोग कृपा करके मेरी एक प्रार्थना सुन लीजिये। वह यह कि जिन कर्मोंके अनुष्ठानसे कर्मों और कर्मवासनाओंका आत्यन्तिक नाश—मोक्ष हो जाय, उनका आप मुझे उपदेश कीजिये॥ २९॥

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