नारदजीने कहा—ऋषियो! यह कोई आश्चर्यकी बात नहीं है कि वसुदेवजी श्रीकृष्णको अपना बालक समझकर शुद्ध जिज्ञासाके भावसे अपने कल्याणका साधन हमलोगोंसे पूछ रहे हैं॥ ३०॥
नातिचित्रमिदं विप्रा वसुदेवो बुभुत्सया।
कृष्णं मत्वार्भकं यन्नः पृच्छति श्रेय आत्मनः॥ ३०
नारदजीने कहा—ऋषियो! यह कोई आश्चर्यकी बात नहीं है कि वसुदेवजी श्रीकृष्णको अपना बालक समझकर शुद्ध जिज्ञासाके भावसे अपने कल्याणका साधन हमलोगोंसे पूछ रहे हैं॥ ३०॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 10.84.30 · गीताप्रेस, गोरखपुर (द्वितीय खण्ड, पृष्ठ 647) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/84/30/