यज्ञैर्देवर्णमुन्मुच्य निर्ऋणोऽशरणो भव॥ ४० ✎ 11981199
tvaṃ tvadya mukto dvābhyāṃ vai ṛṣipitrormahāmate|
yajñairdevarṇamunmucya nir:ṛṇo'śaraṇo bhava|| 40
अर्थ
परम बुद्धिमान् वसुदेवजी! आप अबतक ऋषि और पितरोंके ऋणसे तो मुक्त हो चुके हैं। अब यज्ञोंके द्वारा देवताओंका ऋण चुका दीजिये; और इस प्रकार सबसे उऋण होकर गृहत्याग कीजिये, भगवान्की शरण हो जाइये॥ ४०॥
त्वं त्वद्य मुक्तो द्वाभ्यां वै ऋषिपित्रोर्महामते।
यज्ञैर्देवर्णमुन्मुच्य निर्ऋणोऽशरणो भव॥ ४०
परम बुद्धिमान् वसुदेवजी! आप अबतक ऋषि और पितरोंके ऋणसे तो मुक्त हो चुके हैं। अब यज्ञोंके द्वारा देवताओंका ऋण चुका दीजिये; और इस प्रकार सबसे उऋण होकर गृहत्याग कीजिये, भगवान्की शरण हो जाइये॥ ४०॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 10.84.40 · गीताप्रेस, गोरखपुर (द्वितीय खण्ड, पृष्ठ 648) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/84/40/इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (2)
#1198 अक्षर (मुद्रित पृष्ठके पाठसे): निऋर्णोऽशरणो → निऋर्ऋणोऽशरणो
#1199 अक्षर (मुद्रित पृष्ठके पाठसे): निऋर्ऋणोऽशरणो → निर्ऋणोऽशरणो