महाराज! वसुदेवजीके ऋत्विज् और सदस्य रत्नजटित आभूषण तथा रेशमी वस्त्र धारण करके वैसे ही सुशोभित हुए, जैसे पहले इन्द्रके यज्ञमें हुए थे॥ ४९॥
तस्यर्त्विजो महाराज रत्नकौशेयवाससः।
ससदस्या विरेजुस्ते यथा वृत्रहणोऽध्वरे॥ ४९
महाराज! वसुदेवजीके ऋत्विज् और सदस्य रत्नजटित आभूषण तथा रेशमी वस्त्र धारण करके वैसे ही सुशोभित हुए, जैसे पहले इन्द्रके यज्ञमें हुए थे॥ ४९॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 10.84.49 · गीताप्रेस, गोरखपुर (द्वितीय खण्ड, पृष्ठ 649) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/84/49/