श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.84.70

दशम स्कन्ध · अध्याय 84 · अथ चतुरशीतितमोऽध्यायः

बन्धुषु प्रतियातेषु वृष्णयः कृष्णदेवताः।

वीक्ष्य प्रावृषमासन्‍नां ययुर्द्वारवतीं पुनः॥ ७०

bandhuṣu pratiyāteṣu vṛṣṇayaḥ kṛṣṇadevatāḥ|

vīkṣya prāvṛṣamāsannāṃ yayurdvāravatīṃ punaḥ|| 70

अर्थ

जब सब बन्धु-बान्धव वहाँसे विदा हो चुके, तब भगवान् श्रीकृष्णको ही एकमात्र इष्टदेव माननेवाले यदुवंशियोंने यह देखकर कि अब वर्षा ऋतु आ पहुँची है, द्वारकाके लिये प्रस्थान किया॥ ७०॥✎ 1718

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #1718 पंक्तिके अन्तका योजक-चिह्न: मानने-वाले → माननेवाले

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