श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.85.1

दशम स्कन्ध · अध्याय 85 · अथ पञ्चाशीतितमोऽध्यायः

अथ पञ्चाशीतितमोऽध्यायः

श्रीभगवान्‌के द्वारा वसुदेवजीको ब्रह्मज्ञानका उपदेश तथा
देवकीजीके छः पुत्रोंको लौटा लाना

श्रीबादरायणिरुवाच

अथैकदाऽऽत्मजौ प्राप्तौ कृतपादाभिवन्दनौ।

वसुदेवोऽभिनन्द्याह प्रीत्या संकर्षणाच्युतौ॥ १

athaikadā''tmajau prāptau kṛtapādābhivandanau|

vasudevo'bhinandyāha prītyā saṃkarṣaṇācyutau|| 1

अर्थ

श्रीशुकदेवजी कहते हैं—परीक्षित्! इसके बाद एक दिन भगवान् श्रीकृष्ण और बलरामजी प्रातःकालीन प्रणाम करनेके लिये माता-पिताके पास गये। प्रणाम कर लेनेपर वसुदेवजी बड़े प्रेमसे दोनों भाइयोंका अभिनन्दन करके कहने लगे॥ १॥

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