श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.85.24

दशम स्कन्ध · अध्याय 85 · अथ पञ्चाशीतितमोऽध्यायः

आत्मा ह्येकः स्वयंज्योतिर्नित्योऽन्यो निर्गुणो गुणैः।

आत्मसृष्टैस्तत्कृतेषु भूतेषु बहुधेयते॥ २४

ātmā hyekaḥ svayaṃjyotirnityo'nyo nirguṇo guṇaiḥ|

ātmasṛṣṭaistatkṛteṣu bhūteṣu bahudheyate|| 24

अर्थ

पिताजी! आत्मा तो एक ही है। परन्तु वह अपनेमें ही गुणोंकी सृष्टि कर लेता है और गुणोंके द्वारा बनाये हुए पंचभूतोंमें एक होनेपर भी अनेक, स्वयंप्रकाश होनेपर भी दृश्य, अपना स्वरूप होनेपर भी अपनेसे भिन्‍न, नित्य होनेपर भी अनित्य और निर्गुण होनेपर भी सगुणके रूपमें प्रतीत होता है॥ २४॥

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