॥ श्रीहरिः ॥
श्लोक 10.85.25
खं वायुर्ज्योतिरापो भूस्तत्कृतेषु यथाशयम्।
आविस्तिरोऽल्पभूर्येको नानात्वं यात्यसावपि॥ २५
khaṃ vāyurjyotirāpo bhūstatkṛteṣu yathāśayam|
āvistiro'lpabhūryeko nānātvaṃ yātyasāvapi|| 25
अर्थ
जैसे आकाश, वायु, अग्नि, जल और पृथ्वी—ये पंचमहाभूत अपने कार्य घट, कुण्डल आदिमें प्रकट-अप्रकट, बड़े-छोटे, अधिक-थोड़े, एक और अनेक-से प्रतीत होते हैं—परन्तु वास्तवमें सत्तारूपसे वे एक ही रहते हैं; वैसे ही आत्मामें भी उपाधियोंके भेदसे ही नानात्वकी प्रतीति होती है। इसलिये जो मैं हूँ, वही सब हैं—इस दृष्टिसे आपका कहना ठीक ही है॥ २५॥