श्रीशुकदेवजी कहते हैं—परीक्षित्! भगवान् श्रीकृष्णके इन वचनोंको सुनकर वसुदेवजीने नानात्व-बुद्धि छोड़ दी; वे आनन्दमें मग्न होकर वाणीसे मौन और मनसे निस्संकल्प हो गये॥ २६॥
एवं भगवता राजन् वसुदेव उदाहृतम्।
श्रुत्वा विनष्टनानाधीस्तूष्णीं प्रीतमना अभूत्॥ २६
श्रीशुकदेवजी कहते हैं—परीक्षित्! भगवान् श्रीकृष्णके इन वचनोंको सुनकर वसुदेवजीने नानात्व-बुद्धि छोड़ दी; वे आनन्दमें मग्न होकर वाणीसे मौन और मनसे निस्संकल्प हो गये॥ २६॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 10.85.26 · गीताप्रेस, गोरखपुर (द्वितीय खण्ड, पृष्ठ 655) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/85/26/