श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.85.27

दशम स्कन्ध · अध्याय 85 · अथ पञ्चाशीतितमोऽध्यायः

अथ तत्र कुरुश्रेष्ठ देवकी सर्वदेवता।

श्रुत्वाऽऽनीतं गुरोः पुत्रमात्मजाभ्यां सुविस्मिता॥ २७

atha tatra kuruśreṣṭha devakī sarvadevatā|

śrutvā''nītaṃ guroḥ putramātmajābhyāṃ suvismitā|| 27

अर्थ

कुरुश्रेष्ठ! उस समय वहाँ सर्वदेवमयी देवकीजी भी बैठी हुई थीं। वे बहुत पहलेसे ही यह सुनकर अत्यन्त विस्मित थीं कि श्रीकृष्ण और बलरामजीने अपने मरे हुए गुरुपुत्रको यमलोकसे वापस ला दिया॥ २७॥

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