श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.85.35

दशम स्कन्ध · अध्याय 85 · अथ पञ्चाशीतितमोऽध्यायः

तस्मिन् प्रविष्टावुपलभ्य दैत्यराड्

विश्‍वात्मदैवं सुतरां तथाऽऽत्मनः।

तद्दर्शनाह्लादपरिप्लुताशयः

सद्यः समुत्थाय ननाम सान्वयः॥ ३५

tasmin praviṣṭāvupalabhya daityarāḍ

viśvātmadaivaṃ sutarāṃ tathā''tmanaḥ|

taddarśanāhlādapariplutāśayaḥ

sadyaḥ samutthāya nanāma sānvayaḥ|| 35

अर्थ

जब दैत्यराज बलिने देखा कि जगत‍्के आत्मा और इष्टदेव तथा मेरे परम स्वामी भगवान् श्रीकृष्ण और बलरामजी सुतल लोकमें पधारे हैं, तब उनका हृदय उनके दर्शनके आनन्दमें निम‌ग्‍न हो गया। उन्होंने झटपट अपने कुटुम्बके साथ आसनसे उठकर भगवान्‌के चरणोंमें प्रणाम किया॥ ३५॥

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