श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.85.36

दशम स्कन्ध · अध्याय 85 · अथ पञ्चाशीतितमोऽध्यायः

तयोः समानीय वरासनं मुदा

निविष्टयोस्तत्र महात्मनोस्तयोः।

दधार पादाववनिज्य तज्जलं

सवृन्द आब्रह्म पुनद् यदम्बु ह॥ ३६

tayoḥ samānīya varāsanaṃ mudā

niviṣṭayostatra mahātmanostayoḥ|

dadhāra pādāvavanijya tajjalaṃ

savṛnda ābrahma punad yadambu ha|| 36

अर्थ

अत्यन्त आनन्दसे भरकर दैत्यराज बलिने भगवान् श्रीकृष्ण और बलरामजीको श्रेष्ठ आसन दिया और जब वे दोनों महापुरुष उसपर विराज गये, तब उन्होंने उनके पाँव पखारकर उनका चरणोदक परिवारसहित अपने सिरपर धारण किया। परीक्षित्! भगवान्‌के चरणोंका जल ब्रह्मापर्यन्त सारे जगत‍्को पवित्र कर देता है॥ ३६॥

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