श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
⌕

॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.85.45

दशम स्कन्ध · अध्याय 85 · अथ पञ्चाशीतितमोऽध्यायः

तन्‍नः प्रसीद निरपेक्षविमृग्ययुष्मत्-

पादारविन्दधिषणान्यगृहान्धकूपात्।

निष्क्रम्य विश्‍वशरणाङ्‌घ्र्युपलब्धवृत्तिः ✎ 2138

शान्तो यथैक उत सर्वसखैश्‍चरामि॥ ४५

tannaḥ prasīda nirapekṣavimṛgyayuṣmat-

pādāravindadhiṣaṇānyagṛhāndhakūpāt|

niṣkramya viśvaśaraṇāṅghryupalabdhavṛttiḥ

śānto yathaika uta sarvasakhaiścarāmi|| 45

अर्थ

इसलिये स्वामी! मुझपर ऐसी कृपा कीजिये कि मेरी चित्त-वृत्ति आपके उन चरणकमलोंमें लग जाय, जिसे किसीकी अपेक्षा न रखनेवाले परमहंस लोग ढूँढ़ा करते हैं; और उनका आश्रय लेकर मैं उससे भिन्‍न इस घर-गृहस्थीके अँधेरे कूएँसे निकल जाऊँ। प्रभो! इस प्रकार आपके उन चरणकमलोंकी, जो सारे जगत‍्के एकमात्र आश्रय हैं, शरण लेकर शान्त हो जाऊँ और अकेला ही विचरण करूँ। यदि कभी किसीका संग करना ही पड़े तो सबके परम हितैषी संतोंका ही॥ ४५॥

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #2138 यूनिकोड-रूप (अक्षर वही): ङ्‌घ्रॺुपलब्ध → ङ्‌घ्र्युपलब्ध

पढ़नेकी विधि

अक्षरका आकार
सामान्य
अध्यायमें क्या दिखे
रोमन लिप्यन्तरण (IAST)
पंक्तियोंके बीच
रंग
सहायता

ये विकल्प केवल इसी ब्राउज़रमें रहते हैं; कहीं भेजे नहीं जाते। कुंजियाँ: ?

↑ ↓ चुनें · Enter खोलें · Esc बन्द

कुंजियाँ

←→
पिछला या अगला पृष्ठ (श्लोक, या अध्याय)
/
खोज
CtrlK
किसी अध्याय या श्लोकपर सीधे जाएँ (Mac: ⌘ K)
AltA
पढ़नेकी विधि
?
यह सूची
Esc
खुली सूची बन्द करें